इतिहास सावधान करता है

21 Sep

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भारतीय संस्कृति पर पिछली कुछ सदियों से लगातार विदेशी आक्रमण होते रहे हैं । जो भी महापुरुष वैदिक संस्कृति की पताका फहराते, उनके  खिलाफ  षड्यंत्र रचे जाते और उन्हें बदनाम करने व सताने के भरचक प्रयास किये जाते लेकिन वे लोग उनका बाल भी बाँका न कर सके, उलटा उनके कुप्रचार से वे संत ही और अधिक महिमा मंडित हुए।

संत कबीरजी के खिलाफ हिन्दुस्तानियों को ही हथकंडा बनाया गया। कुप्रचार कों ने कबीरजी की निंदा के लिए एक वेश्या को पटाकर उनके ऊपर चरित्रहीनता का आरोप भरे बाजार में लगवाया। केवल यही नहीं, वेश्याने अपने सुमंत नामक प्रेमी द्वारा संत कबीरजी का घास-फूस का छप्पर जलवा दिया। संत के सत्संगियों को धूप में बैठना पड़ा । इससे कबीरजी को कष्ट हुआ और आकाश की ओर देखते हुए उनके मुँह से उफ़ निकल गयी। इतना ही होना था कि बस, वेश्या का पक्का आलीशान मकान धू-धूकर जलकर खाक हो गया। लोगों ने वेश्या को बताया कि संत को सताने का ही यह फल है । वेश्या कबीरजी के पास गयी तो उन्होंने कहा : ‘‘मैंने कुछ नहीं किया है । तेरे यार ने मेरा झोंपडा जलाया तो मेरे यार ने भी तेरा घर जला दिया।

संत को सताने वाले, उनकी निंदा करने वाले पर प्रकृति का कोप निश्चित रूप से होता है ।

स्वामी विवेकानंदजी द्वारा विदेशों में वैदिक सद्ज्ञान का डंका बजाये जाने से ईसाई मिशनरी बौखला गये। उन्होंने विवेकानंदजी के खिलाफ घृणित आरोप लगाना शुरू कर दिया। उस समय मिशनरियों के हथकंडे बने बिकाऊ अखबारों- ‘नार्दम्पटन डेलीहेराल्डङ्क,  ‘बोस्टनङ्क,  ‘इवनिंग ट्रान्स क्रिप्टङ्क,  ‘क्रिश्चियन एडवोकेटङ्क,  ‘डिट्राईट ट्रिब्यूनङ्क,  ‘डिट्राईटजरनलङ्क आदि ने उनके बारे में रँगीला बाबू, युवतियों से घिरा हुआ बदचलन साधु तथा अवयस्क नौकरानी से संबंधों की गाथा आदि अनर्गल प्रलाप किया। ऐसा पोस्टर जिसमें उन्हें अर्ध नग्न लडकी के साथ दिखाया गया था, उनके प्रवचन-स्थल के सामने चिपका दिया गया। अपने स्वार्थ में बाधा आती देख विवेकानंदजी के कुप्रचार में लगे अपने ही देश के प्रतापचन्द्र मजूमदार अमेरिका में अपनी चाल में विफल हुए तो कलकत्ता आकर विवेकानंदजी का चरित्र हनन करने लगे। इधर वे उन पर जालसाज ठग, बहुस्त्रीगामी  आदि  आरोप लगवा रहे थे,  उन्हें हिन्दुओं के किसी सम्प्रदाय का प्रतिनिधि न बताकर  खिल्ली  उडा  रहे थे और उधर ‘आऊटलुकङ्क,  ‘बोस्टन  डेली  एडवरटाइजरङ्क, ‘डिट्रायट फ्री प्रेसङ्क आदि बिकाऊ अखबारों ने उन्हें स्वेच्छाचारी रमणीप्रेमी आदि उपमाएँ दे दीं। ‘इंटीरियरङ्क पत्रिका ने उनके संबंध में भोंडे समाचार छापे। कुप्रचारकों ने विवेकानंदजी के सर्वनाश का भी ऐलान कर दिया।

परंतु विवेकानंदजी को ऐसे झूठे दुष्प्रचार की न कोई चिंता थी और न ही कोई परवाह भी । वे संकल्प में मजबूत होते जा रहे थे। इस कारण उनके चाहने वालों के बहुत कहने पर भी उन्हों ने इस दूषित व अश्लील दुष्प्रचार का प्रतिवाद नहीं किया।

‘बोस्टन डेली एडवरटाइजरङ्क का एक पत्रकार ब्लू बार्बर उनका इंटरव्यू लेने आया। प्रस्तुत हैं उसके कुछ अंश :

(प्रश्नकर्ता आरोप लगाते हुए…)

प्रश्न : आपके दुराचरण से परेशान होकर मिशीगन के भूतपूर्व गवर्नर की पत्नी श्रीमती बैगली ने अपनी अल्प वयस्क नौकरानी को निकाल दिया। यह सब अखबारों में छप चुका है । आप को क्या कहना है ?

उत्तर : इसके लिए कृपया आप श्रीमती बैगली से पूछें और उनकी बात पर विश्वास करें ।… और सोचने-समझ ने की यदि शक्ति हो,  नीर-क्षीर विवेकी बनने की इच्छा होतो उस नौकरानी से जाकर पूछें । थोडा परिश्रम तो करना पडेगा।

प्रश्न : आप को कुछ नहीं कहना (उपरोक्त विषय में) ?

उत्तर : नहीं।

प्रश्न : श्री हेल ने अपनी पुत्रियों को आपसे मिलने से रोका है ? …क्यों ?

उत्तर : उनकी दोनों अविवाहित पुत्रियाँ यहाँ मेरे साथ बैठी हुई हैं ।… उनसे पूछकर देखिये, परंतु मेरे सम्मुख नहीं, अलग से ।

विवेकानंदजी ने कुछ रुककर कहा : ‘‘आप भाग्यशाली हैं । श्री बैगली और उनकी नौकरानी, जिसके लिए आपके अखबार ने ‘विवश होकर निकाल ना पडा’ ऐसा लिखा है,  वे आ रहे हैं ।

ब्लू बार्बर सकप का गया। उसको ठंड में पसीने  आ  गये परंतु झेंप  के  कारण रुमाल निकाल कर पसीना पोंछ नहीं सका।

विवेकानंदजी ने कहा : ‘‘ब्लू बार्बर ! कृपया आप अपना पसीना पोंछ लें । मुझे खेद है कि यहाँ पत्रकारिता का चरित्र अविश्वसनीय है । यह यहाँ के विकास के लिए अशुभ लक्षण है । मुझे और कुछ नहीं कहना है और जो कहा है वह छपेगा भी नहीं। वे उठकर चल दिये। पत्रकार पसीना पोंछता रह गया।

संत पर आरोप लगाके, उनके इंटरव्यूज को तोड-मरोडकर पेश करके या उनके नाम परझूठे वक्तव्य छाप के श्रद्धालुओं के हृदय को पीडा पहुँचाने वाले ऐसे लोगों को कुछ कमाई हो भी जाय तो भी वह क्या परिणाम लाती है, इतिहास उसका गवाह है ।

किसीने ठीक हीकहा है :

अगर आराम चाहे तू,  दे आराम खलकत को।

सताकर गैर लोगों को,  मिलेगा कब अमन तुझ को।।

दूसरी ओर जो समाज और संत के बीच सेतु बनकर धर्म, संस्कृति एवं देश की उन्नति का प्रयास करते हैं, वे महापुरुषों के साथ अपना भी नाम रोशन कर लेते हैं ।

स्वामी विवेकानंदजी को आज सारी दुनिया जानती है परंतु लोगों को गुमराह करने का भयंकर पाप लेकर अपने कुल-खानदान को भी कलंकित करने वाले निंदक नष्ट-भ्रष्ट हो गये।

प्रसिद्ध संत नरसिंह मेहता की भी कुप्रचारकों ने खूब नींद की । जिन्हें संतों के द्वारा हो रहा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार सुहाता नहीं था, ऐसे लोगों ने उन महान संत के खिलाफ उन्हीं की जाति के लोगों को भडकाया और उनकी भयंकर निंदा करवायी,  उन्हें जाति से बहिष्कृत करवाया। फिर भी भगवान की कृपा से उनका सारा काम अच्छी तरह से चलता रहा। अंत में संतद्रोहियों ने चंचला नामक एक वेश्या को उन्हें भ्रष्ट करने के लिए भेजा किन्तु संत की कृपादृष्टि और उनके पावन उपदेश से उस वेश्या का जीवन ही बदल गया। वह वेश्यावृत्ति छोडकर भगवान के भजन में लग गयी। दूसरी ओर सारंगधर नामक जिस हथकंडे ने यह षड्यंत्र रचा था उसे एक विषधर सर्प ने काट लिया, जिससे वह मृत्यु के मुँह में पहुँच गया। कोई इलाज काम नहीं आया। किसी ने सुझाव दिया कि नरसिंह मेहता आजकल जादूगर बने हैं । वहाँ भी प्रयास करके देखा जाय । लोग उसे नरसिंह मेहता के पास ले गये। वहाँ भगवान के चरणामृत से उसका विष उतर गया और वह ठीक हो गया।

ऐसे उदार संत की महिमा आज जग जाहिर है पर वे अधम निंदक कितने जन्मों तक कौन-कौन-सी नारकीय यातनाएँ झेलेंगे वे ही जानें ।

गुरु नानकदेव जी हिन्दू संस्कृति का प्रचार करते थे तो उनके खिलाफ भी उन्हीं के जाति वालों को हथकंडा बनाकर कुप्रचार किया गया। ‘उलटा मार्ग दसेंदा जी आदि-आदि कहकर उनका खूब विरोध किया गया। उनको भी सताने का भरपूर प्रयास किया गया किन्तु आज हिन्दू व सिख समाज बडे आदर से गुरु नानकदेव जी का नाम लेता है । निंदको के लिए ‘गुरुवाणी में आया है :

संतका निंदकु महा हतिआरा।

संतका निंदकु परमेसुरि मारा ।

संत के दोखी की पुजै न आसा।

संत का दोखी उठि चलै निरासा। …आदि ।

तो निंदकों की ऐसी दुर्गति होती है । काश ! पूज्य बापूजी के विरुद्ध कुप्रचार में लगे अधम लोग इन प्रसंगों से कुछ प्रेरणा लें और संत की निंदा जैसे कलुषित कर्मों से बाज आयें ।

राजेश सोलंकी जेल में गया, अमृत वैद्य का चित्र भी देख लीजिये- उसने भी सलाखों का मजा थोडा-सा  लिया है । दूसरे लोग सबक लें,  सुधर  जायें  तो  कितना अच्छा !  अपने देश को तोडने वाले देश को तोडनेवाली ताकतों के हथकंडे न बनें । ऐसे हथकंडे बने कुछलोग जेल में जा चुके हैं । कुछ लोगों के घर आपदा नृत्य कर रही है तो कुछ के घर आपदा आने की तैयारी कर रही है । हमारी नम्र प्रार्थना है कि देशवासी आपस में भाईचारे से रहें । निंदा, विद्रोह फैलाने वालों की साजिश के शिकार न बनें । राज्य की, देश की जनता के साथ कोई जुल्म न करें । श्रद्धा तोडना बडा भारी जुल्म है ।

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